श्री मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग प्रादुर्भाव पौराणिक कथा

हमारे देश में कुल 12 ज्योतिर्लिंग हैं पहला श्री सोमनाथ जिसका वर्णन पहले किया जा चूका है। दूसरा ज्योतिर्लिंग है मल्लिकार्जुन। शिवपुराण में मल्लिकार्जुन के प्रादुर्भाव के विषय में जिस कथा का उल्लेख है वह इस प्रकार है।

भगवान् शिव पार्वती द्वारा रचित प्रतियोगिता

शिव जी और पार्वती जी के पुत्र कार्तिकेय और गणेश दोनों विवाह करना चाहते थे। भाइयों में बड़े होने के कारण कार्तिकेय का कहना था की उनका विवाह पहले होना चाहिए, किन्तु गणेश अपना विवाह पहले करना चाहते थे। इस बात को लेकर वे दोनों अपने माता-पिता भवानी और शंकर के पास पहुँचे। भोलेनाथ और माता पार्वती ने कहा कि तुम दोनों में जो कोई भी पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले वापिस कैलाश आ जाएगा, उसी का विवाह पहले होगा। यह सुनते ही कार्तिकेय जी पृथ्वी की परिक्रमा करने के लिए अपने वाहन मोर पर चल पड़े। परन्तु गणेश जी स्वयं भी स्थूलकाय थे और उनका वाहन भी चूहा, वह परिक्रमा में इस प्रकार पहले वापिस नहीं आ सकते थे। किन्तु गणेश जी की बुद्धि की तुलना पुरे ब्रह्माण्ड में किसी से नहीं। उन्होंने सोच-विचार करके युक्ति लगाकर अपनी माता पार्वती तथा पिता महेश्वर से एक आसन पर बैठने का आग्रह किया। और फिर उन दोनों के बैठ जाने के बाद श्रीगणेश ने उनकी सात परिक्रमा की, और पूजन किया।

विजय और फल

उनकी चतुर बुद्धि को देख कर शिव और पार्वती दोनों बहुत प्रसन्न हुए और गणेश जी को विजयी घोषित कर करके उनका विवाह भी करा दिया। कार्तिकेय जी अभी परिक्रमा कर ही रहे थे। जिस समय स्वामी कार्तिकेय सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आये, उस समय तक श्रीगणेश जी का विवाह सिद्धि और बुद्धि के साथ हो चुका था। इस बात से नाराज़ कार्तिकेय जी ने शिष्टाचार का पालन करते हुए अपने माता-पिता के चरण छुए और वहाँ से चल दिये।

ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव

स्वामी कार्तिकेय कैलाश छोड़ क्रौंच पर्वत पर निवास करने लगे। माता पार्वती अपने पुत्र से न मिलने के कारण और उनके प्रति स्नेहभाव से भगवान शिव के साथ कार्तिकेय जी से मिलने क्रौंच पर्वत पर गयीं। वहां जाकर उनके अनुरोध करने पर भी कार्तिकेय जी नहीं लौटे तथा वहां से भी 12 कोस दूर चले गए। तब भगवान् शिव और माता पार्वती ज्योतिर्मय स्वरूप धारण करके वहां प्रतिष्ठित हो गए। वे दोनों पुत्रस्नेह से आतुर हो पर्व के दिन अपने पुत्र कार्तिकेय को देखने के लिए उनके पास जाया करते हैं अमावस्या के दिन भगवान शंकर स्वयं वहां जाते हैं और पूर्णमासी के दिन पार्वती जी निश्चय ही वहां पदार्पण करती हैं उसी दिन से लेकर भगवान शिव का मल्लिका अर्जुन नामक एक लिंग तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुआ। ‘मल्लिका’ माता पार्वती का नाम है, जबकि ‘अर्जुन’ भगवान शंकर को कहा जाता है।

मल्लिकार्जुन की महत्वता

उस लिंग का जो दर्शन करता है वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है| इस प्रकार मल्लिका अर्जुन नामक ज्योतिर्लिंग का वर्णन किया गया जो दर्शन मात्र से लोगों के लिए सब प्रकार का सुख देने वाला बताया गया है। कुछ ग्रन्थों के अनुसार केवल शिखर के दर्शन मात्र से सभी प्रकार के कष्ट दूर भाग जाते हैं, और अनन्त सुखों की प्राप्ति होती है। व्यक्ति जीवन मरण से मुक्त हो जाता है।

आन्ध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल पर्वत पर श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं। इसे दक्षिण का कैलाश भी कहते हैं। यहाँ पर महाशिवरात्रि के दिन मेला लगता है। सावन मास में मल्लिकार्जुन के दर्शन का बड़ा महत्व है।

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