नवधा भक्ति

मुनियों में सगुण और निर्गुण भक्ति के नौ अंग बताये है। जो नवधा भक्ति के नाम से प्रसिद्ध है –
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, दास्य, अर्चन, वंदन, सख्य और आत्मसमर्पण

ये भक्ति के नौ रूप भक्तो के ही नौ रूप है जिनके द्वारा वह अपने भगवान को पूजता है, मनाता है और रिझाता है। ये नौ अंग भक्त और भगवान के ९ रिश्तो का ही व्याख्यान करते है।

  • श्रवण – जो स्थिर आसन से बैठकर तन-मन आदि से कथा-कीर्तन आदि का नित्य सम्मान करता हुआ प्रसन्नतापूर्वक अपने श्रवणपुटो से उसके अमृतोपम रस का पान करता है, उसके इस साधन को श्रवण कहते है। एकचित हो ईश्वर की महिमा, नाम आदि को सुनना ही श्रवण है।
  • कीर्तन – जो हृदयाकाश से प्रभु का चिंतन करता हुआ उच्चःस्वर से उच्चारण करता है, उसके इस भजन साधन को कीर्तन कहते है। प्रभु के नाम का गान का पान स्वयं करना और दूसरों को भी कराना ही कीर्तन है।
  • स्मरण – अपने देव की नित्य स्मृति बने रहना और अपने इष्ट को सदा, सर्वत्र, व्यापक जानकार जो संसार में नित्य निर्भय रहता है, उसी को स्मरण कहा गया है।
  • सेवन – अरुणोदय से लेकर हर समय सेव्य के अनुकूलता का ध्यान रखते हुए हृदय और इन्द्रियों से जो निरंतर सेवा की जाती है, वही सेवन नाम की भक्ति है। दिन हो या रात अपना पूर्ण समय ईश्वर की सेवा में अर्पित करना सेवन है।
  • दास्य – स्वयं को प्रभु का किंकर समझ कर हृदयामृत के भोग से स्वामी का सदा प्रिय संपादन करना दास्य कहा गया है। अपने इष्ट की सेवा में सदा दासता का भाव रखना और उन्हें दाता रूप से पूजना ही दास्य है।
  • अर्चन – अपने धन-वैभव के अनुसार शास्त्रीय विधि से जो अपने इष्ट देव को सदा पाद्य आदि सोलह उपचारों का जो समर्पण करना है, वह अर्चन कहलाता है। सामर्थ्य अनुसार प्रभु का फल फूल आदि से विधिपूर्वक पूजन ही अर्चन है।
  • वंदन – मन से ध्यान और वाणी से वन्दनात्मक मन्त्रों के उच्चारणपूर्वक आठों अंगों से भूतल का स्पर्श करते हुए जो इष्टदेवता को नमस्कार किया जाता है, उसे वंदन कहते है।
  • सख्य – ईश्वर मंगल या अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगलके लिए ही है। ऐसा दृढ़ विश्वास रखना सख्य भक्ति का लक्षण है। ईश्वर को ही अपना सच्चा सखा (दोस्त) मानना ही सख्य भाव से भक्ति कहलाता है।
  • आत्मसमर्पण – देह आदि जो कुछ भी अपनी कही जाने वाली वस्तु है, वह सब भगवान की प्रसन्नता के लिए उन्ही को समर्पित करके अपने निर्वाह के लिए भी कुछ बचाकर न रखना अथवा निर्वाह की चिंता से भी रहित हो जाना आत्मसमर्पण कहलाता है।

यह भक्तो के नौ अंग मोक्ष और भोग प्रदान करने वाले है। इनसे ज्ञान का प्राकट्य होता है। कलियुग में प्रायः ज्ञान और वैराग्य के कोई ग्राहक नहीं है जो की मोक्षकारक है। परन्तु भक्ति कलियुग तथा अन्य युगो में भी प्रत्यक्ष फल देने वाली है। तीनो लोको और चारों युगों में भक्ति के समान दूसरा कोई सुखदायक मार्ग नहीं है। भक्ति से भगवान भक्त के वश में ही उसकी हर स्थिति में शरणागतवत्सल होते है। वह अपने भक्तो की रक्षा के भार का वहां कर उसे हर संकट से बचाते है।

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