केदारनाथ ज्योतिर्लिंग के प्रादुर्भाव की पौराणिक कथा

हमारे देश में 12 ज्योतिर्लिंग में से केदारेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन जिस प्रकार शिवपुराण में है वह कथा निम्नलिखित है।
यह केदारनाथ की कथा सूत जी ब्राह्मणो को सुना रहे है। सूत जी कहते है –
भगवान विष्णु के नर नारायण अवतार है जो भारतवर्ष के बद्रिकाश्रम तीर्थ में तपस्या करते थे। उन दोनों ने पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसमे स्थित हो पूजा ग्रहण करने के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की। शिवजी भक्तो के प्रेम के वश में होने के कारण प्रतिदिन उनके बनाये हुए शिवलिंग में पूजित होने के लिए आया करते थे। जब उन दोनों के पूजन करते करते बहुत दिन व्यतीत हो गए, तब एक दिन परमेश्वर शिव ने प्रसन्न होकर कहा – मैं तुम्हारी आराधना से बहुत संतुष्ट हूँ। तुम दोनों मुझसे वरदान मांगो क्योकि तुम इसके योग्य हो।उस समय प्रभु शंकर के ऐसा कहने पर नर और नारायण ने लोगो के हित की कामना से कहा – प्रभु ! यदि आप प्रसन्न है और हमें वर देना चाहते है तो अपने स्वरुप से पूजा ग्रहण करने के लिए हमेशा के लिए यही स्थित हो जाइये।

उनके इस प्रकार अनुरोध करने पर कल्याणकारी महेश्वर शिव हिमालय के उस तीर्थ केदार में स्वयं ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गए। उन दोनों से पूजित होकर सम्पूर्ण दुख और भय का नाश करने वाले शम्भू लोगो का उपकार करने और भक्तों को दर्शन देने के लिए स्वयं केदारेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हो वहां रहते है। वे दर्शन और पूजन करने वाले भक्तों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करते है। उसी दिन से लेकर जिसने भी भक्तिभाव से भगवान् केदारनाथ का पूजन किया, उसके लिए स्वपन में भी दुख दुर्लभ हो गया। जो भगवान शिव का प्रिय भक्त वहां शिवलिंग के निकट शिव के रूप से अंकित वलय (कंकण या कड़ा) चढ़ाता है, वह उस वलययुक्त स्वरूप का दर्शन करके समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, साथ ही जीवन्मुक्त भी हो जाता है। जो बदरीवन की यात्रा करता है उसे भी जीवनमुक्ति प्राप्त होती है।

नर और नारायण के तथा केदारेश्वर शिव के रूप का दर्शन करके मनुष्य मोक्ष का भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। केदारनाथ में भक्ति रखने वाले जो पुरुष वहां की यात्रा आरम्भ करके उनके पास तक पहुंचने के पहले ही मर जाते है, वे भी मोक्ष पा जाते है। केदारतीर्थ में पहुंचकर वहां प्रेमपूर्वक केदारेश्वर की पूजा करके वहां का जल पी लेने के पश्चात मनुष्य का फिर जन्म नहीं होता।

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