श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग प्रादुर्भाव पौराणिक कथा

हिन्दू ग्रन्थ शिव पुराण में तीसरे ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर की जिस कथा का उल्लेख है वह इस प्रकार है –

भारतवर्ष में उज्जैन नाम से प्रसिद्ध नगर है जो समस्त प्राणियों को मोक्ष देने वाली है। वह नगरी भगवन शिव को अत्यंत प्रिय है। उस पूरी में एक ब्राह्मण भक्त रहते थे जो हमेशा शुभ कर्मो में अनुरक्त रहते थे। वेदों के अध्ययन तथा वैदिक अनुष्ठानो में सदा तत्पर रहते थे। प्रतिदिन घर में अग्नि की स्थापना कर अग्निहोत्र आदि नित्य कर्म करते और भगवन शिव की पूजा में संलग्न रहते थे। ब्राह्मण देवता प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करते थे। वेदप्रिय नाम के वे ब्राह्मण ज्ञानार्जन में लगे रहते थे इसीलिए उन्होंने अपने इन्ही कर्मो और भक्ति भाव के कारण वह सद्गति प्राप्त कर ली जो संतो को ही सुलभ होती है।

उनके चार पुत्र थे जो माता पिता का ही अनुसरण करते थे। उनके नाम थे देवप्रिय प्रियमेधा सुकृत और सुव्रत। इन चारो पुत्रो के गुण दिनोदिन बढ़ते गए और उनके तेज से पवित्र उज्जैन नगरी और भी तेजस्वी हो गयी।

उसी समय रत्नमल पर्वत पर दूषण नामक एक धर्म द्वेषी असुर ने ब्रह्मा जी से वरदान पाकर वेद, धर्म और धर्मात्माओं पर आक्रमण किया। उसने सेना लेकर अवन्ति उज्जैन के ब्राह्मणों पर भी चढाई कर दी। उसकी आज्ञा से चार भयानक असुर चारों दिशाओं में फैले। अग्नि के सामान प्रकट हो गए। परन्तु वे शिव विश्वासी ब्राह्मण बंधु उनसे भयभीत नहीं हुए। जब नगर के ब्राह्मण बहुत घबरा गए तब उन्होंने ने आश्वासन देते हुए कहा आप लोग भक्त वत्सल भगवन शिव पर भरोसा रखें। ऐसा कहकर शिवलिंग का पूजन करके वे भगवान शिव का ध्यान करने लगे।

इतने में ही सेना सहित दूषण ने आकर उन ब्राह्मणों को देखा और कहा इन्हे मार डालो बाँध डालो। वेदप्रिय के पुत्र उन ब्राह्मणों ने उस समय उस असुर की कही हुई बातें नहीं सुनी क्यूंकि वे भगवान शम्भू के ध्यान में थे। उस दुष्ट आत्मा दैत्य ने जैसे ही उन ब्राह्मणों को मारने की इच्छा की वैसे ही उनके द्वारा पूजित शिवलिंग के स्थान पर बड़ी भारी आवाज़ के साथ एक गधा प्रकट हो गया। उस गधे से तत्काल विकटरूप धारी भगवान शंकर प्रकट हो गए जो महाकाल नाम से विख्यात हुए। वे दुष्टों के विनाशक तथा सत्य पुरुषों के आश्रय दाता है। उन्होंने उस असुर से कहा ‘अरे दुष्ट ! मैं तुझ जैसे के लिए महाकाल प्रकट हुआ हूँ। तुम इन ब्राह्मणों के निकट से दूर भाग जाओ।’

ऐसा कहकर महाकाल शंकर भगवान् ने सेना सहित दूषण को अपने हुंकार मात्र से तत्काल भस्म कर दिया। कुछ सेना उनके द्वारा मारी गयी और कुछ भाग खड़ी हुई। भगवान शिव ने दूषण का वध कर डाला। जैसे सूर्य से सम्पूर्ण संसार का अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही भगवान शिव को देख राक्षस सेना अदृश्य हो गई। देवताओ की दुन्दुभियाँ बज उठी और आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी। उन ब्राह्मणों को आश्वासन दे प्रसन्न हुए भगवान् महाकाल महेश्वर शिव ने उनसे कहा तुम लोग वर मांगो। उनकी बात सुनकर ब्राह्मण हाथ जोड़ कर भक्ति भाव से भली भांति प्रणाम करके बोले, उन्होंने कहा – ‘महाकाल महादेव ! दुष्टों को दंड देने वाले प्रभु शम्भू ! आप हमें संसार सागर से मोक्ष प्रदान करें। शिव आप जनसाधारण की रक्षा के लिए सदा यही वास करें। अपने दर्शन करने वाले भक्तो का आप सदा ही उद्धार करें।’

सूत जी कहते है उनकी ऐसी प्रार्थना पर उन्हें सद्गति दे भगवान् महाकाल अपने भक्तों की विनती मान उनकी रक्षा के लिए उस परम सुन्दर गड्ढे में स्थित हो गए। वे ब्राह्मण मोक्ष पा गए और वहां चारों ओर की एक कोस भूमि लिंग रूपी भगवान् शिव का स्थान बन गयी। वे शिव भूतल पर महाकालेश्वर के नाम से विख्यात हुए। ब्राह्मणों उनका दर्शन करने में स्वपन में भी कोई दुःख नहीं होता। जिस जिस कामना को लेकर जो कोई उस लिंग की उपासना करता है उसे अपना मनोरथ प्राप्त हो जाता है तथा परलोक में मोक्ष भी मिल जाता है।

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